Climatic change in South Asia

Climatic change is the main cause for melting of glaciers.And one of the the main pollutant responsible for rise in temperature is the smoke and gases produced by burning of fossil fuels.The research carried out at Peshawar indicated that that the number of vehicles in Peshawar increased from 1999 to 2012 more than seven folds.The research was carried out to know the impact of used engine oil in the study area.The aerosol is formed in the air by the escaping gases from the collar of the vehicles.Which is also main cause for the fog formation on the motorway from Peshawar to Islamabad.
The number of vehicles in Hindukush and Himalayan region has increased tremendously and all these vehicles run by Fossil fuel which on burning generate green house gases such as CO,CO2 and in CNG run vehicle methane gas also escape to air.These gases are causing the rise of temperature and so melting of glaciers has also increased.
Another finding of the study is the burning of used engine oil in brick kilns.In the brick kiln used engine oil is used as a chief source of energy and in the brick kiln it is used with other burning material e.g.,wood etc to enhance burning.The used engine oil burn incompletely releasing metals and green gases to the environment.
The policy makers of the region must consider this factor to mitigate the effect of vehicle contribution.

Key words Alternative energy, fossil fuels, green house gases, Used engine oil, climatic change,temperature rise ,global warming,CC.

जौ व जई से पर्यावरण बचाने की मुहिम

  • संतोष सारंग

ग्लोबल वार्मिंग के बढ़ते ख़तरों को देखते हुए और लोगों में पर्यावरण के प्रति जागरूकता पैदा करने के मकसद से हर साल पांच जून को पर्यावरण दिवस मनाया जाता है। सवाल यह उठता है कि क्या जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वार्मिंग जैसे मुद्दों से निपटने के लिए क्या वैश्विक स्तर पर गंभीर प्रयास हो रहे हैं। पर्यावरण के बिगाड़ का मामला किसी देश या विदेश से नहीं जुड़ा है बल्कि इसको बिगाड़ने में आज छोटे बड़े सभी देश शामिल हैं। ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन और तापमान में वृद्धि का सबसे बुरा असर परिस्थितीय तंत्र और जीवन चक्र पर पड़ा है। ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन ने पर्यावरण को तो दूषित किया ही है, साथ ही साथ इसने फसल चक्र को भी काफी प्रभावित किया है। सवाल यह उठता है कि पर्यावरण को बचाने के लिए क्या वैश्विक स्तर पर कुछ हो रहा है? क्या हम कभी इस समस्या से निपट पाएंगे? क्या हम अपनी आने वाली पीढ़ी को स्वच्छ वातावरण उपलब्ध करा पाएंगे? वर्तमान परिस्थिति को देखकर तो ऐसा नहीं लगता। हां कुछ लोग ज़रूर हैं जो पर्यावरण को बचाने के लिए प्रयासरत हैं। हमें यह समझना होगा कि पर्यावरण को बचाने की ज़िम्मेदारी सिर्फ केद्र सरकार और राज्य सरकारों की ज़िम्मेदारी नहीं है।

पर्यावरण को स्वच्छ रखना हम सब की ज़िम्मेदारी है। ग्लोबल वार्मिंग का खतरा आज जिस तरह से बढ़ रहा है, उससे कोई अंजान नहीं है। शहर तो शहर, गांव-देहात के लोग भी पर्यावरण संरक्षण की दिशा में थोड़े-बहुत ही सही, पर सोचने लगे हैं। छत्तीसगढ़ में आई विनाशकारी प्राकृतिक आपदा एवं चक्रवाती तूफान फैलिन ने सोए लोगों को जगाया है। सरकारी व गैर सरकारी स्तर पर धरती को बचाने को लेकर चिंता की जा रही है। गत दो-तीन साल से बिहार के समाचार पत्रों ने दीपावली पर केरोसिन व पटाखों का प्रयोग न करने को लेकर स्कूली छात्र-छात्रों व लोगों के बीच अभियान चलाया है। इसका असर भी दिख रहा है। बीते दीपावली पर मुज़फ़्फ़रपुर के छात्र-छात्रों ने पटाखों के पैसे बचा कर एक अस्पताल में भर्ती मरीजों के बीच फल व कपड़े बांट कर पर्यावरण बचाने का संदेश दिया। मोतिहारी में एक स्कूल के बच्चों व प्रबंधन ने मिलकर प्रकाश पर्व दीपावली पर पौधे रोप कर अभियान को आगे बढ़ाया।

जौ और जई से पर्यावरण बचाने का मुहिमपॉलीथिन से मिट्टी, पानी दूषित हो रहा है। इसके अंधाधुंध प्रयोग से नाले, नदियां एवं शहर के ड्रेनेज सिस्टम की सेहत बिगड़ रही है। कागज़ और कपड़े के झोले गायब हो गए। एक समय था जब हम बाज़ार जाते थे, घर से कपड़े का थैला ले जाना नहीं भूलते थे। लेकिन आज हम एक माचिस भी खरीदते हैं, तो दुकानदार से पॉलीथिन मांगना नहीं भुलते हैं। पॉलीथीन के बढ़ते इस्तेमाल से आज घर-घर ,गली-गली ,सड़कों पर पॉलीथिन का कचरा बिखरा पड़ा दिख जाता है। जानवर कूड़े के ढेर पर जूठन या अन्य सामान खाते हैं, वे पॉलीथिन भी खा जाते हैं। यह उसके लिए हानिकारक है। पॉलीथिन के खतरे से निपटने के लिए कई प्रदेशों ने इस पर प्रतिबंध लगाया है। मुज़फ़्फ़रपुर नगर निगम ने हाल में पॉलीथिन के प्रयोग पर प्रतिबंध लगाया है। प्रतिबंध के बावजूद पॉलीथिन का प्रयोग करने वाले दुकानदारों पर जुर्माना लगाया जा रहा है। इस तरह की कार्रवाई के ज़रिए ही हम पॉलीथिन के इस्तेमाल को कम कर सकते हैं।

इधर, कृषि क्षेत्र में भी ग्लोबल वार्मिंग के खतरे से निपटने के लिए कवायद चल रही है। बिहार का कृषि विभाग तापमान को नियंत्रित रखने वाली खरीफ व रबी की चार फसलों जौ, जई, मडुवा व बाजरे से पर्यावरण संरक्षण की मुहिम को तेज करने जा रहा है। राज्य सरकार ने राष्ट्रीय कृषि विकास योजना में इन चारों फसलों को शामिल किया है, ताकि किसान इन फसलों को उगा कर पर्यावरण मित्र की अहम भूमिका निभा सके। दरअसल, जौ व जई की खेती में लागत कम होने के साथ रासायनिक खाद व कीटनाशकों का प्रयोग भी नहीं करना पड़ता है। इन फसलों को पानी भी अधिक नहीं चाहिए। लिहाज़ा इसकी खेती से पानी का बचत भी होगा। इन फसलों को लगाने लिए विभाग ने किसानों को प्रोत्साहन देने का मन बनाया है। जौ व जई की खेती के लिए 1600 रुपए प्रति एकड़ प्रोत्साहन राशि दी जाएगी। मुज़फ़्फ़रपुर के जिला कृषि पदाधिकारी के के शर्मा कहते हैं ‘‘राज्य सरकार ने टीडीसी को जौ व एनएससी को जई का बीज उपलब्ध कराने का निर्देश दिया है।

जौ और जई से पर्यावरण बचाने का मुहिममक्का, धान, गेहूं के मुकाबले इन फसलों में रासायनिक खाद व कीटनाशकों का प्रयोग नगण्य होता है। राज्य सरकार की ओर से इन फसलों को प्रोत्साहन देने का मुख्य उदेश्य किसानों में पर्यावरण के प्रति जागरूकता पैदा करना है। केंद्र सरकार के साथ-साथ राज्य सरकारें पर्यावरण को नुकसान से बचाने के लिए तरह तरह के उपाय कर रही है। लेकिन लोगों में जागरूकता की कमी की वजह से सरकार की ओर से चलाई जा रही पर्यावरण बचाओ मुहिम का फायदा बहुत ज़्यादा नहीं हो पा रहा है। पर्यावरण को साफ सुथरा बनाए रखने के लिए सभी को अपना कर्तव्य समझना होगा और साथ मिलकर काम करना होगा। कहने का तात्पर्य यह है कि अगर पर्यावरण के प्रति हमने संजीदगी न दिखाई तो आने वाला समय भयावक हो सकता है। अब वक्त आ गया है कि सभी राष्ट्र विकसित और विकासशील की श्रेणी से उठकर पर्यावरण खतरे का निदान ढूंढे। हमें पुरानी गलतियों से सीख लेकर एक साथ इस समस्या के निदान के लिए काम करना होगा।

India Water Portal

Once ignored, mountain agendas now draw global attention

OM ASTHA RAI

Three years ago, Prof John Beddington, then chief scientist of the UK government, warned that shortages of food, water and energy would unleash public unrest, cross-border conflicts and mass migration by 2030.

At a recent conference on poverty and vulnerability in the Hindu Kush Himalaya (HKH) region, organized by the International Center for Integrated Mountain Development (ICIMOD) and Nepal”s National Planning Commission (NPC) in Kathmandu, Dr Bruno Messerli, former rector of University of Bern, recalled what Prof Beddington had cautioned in the 2009 conference on sustainable development.

Putting Prof Beddington”s caution into perspective, Dr Messerli said, ´The food-energy-water security is intrinsically linked to the sustainability of mountains and mountain communities. Mountains could, therefore, play a very important political role in future.´ The opinion of Dr Messerli, who interacted with journalists on the last day of the conference, was unequivocal: much of resources like food, water and energy come from mountains and future public unrests cannot be averted without ensuring sustainability of mountains.

However, as the world marks the World Mountain Day on Wednesday, concerns over sustainability of mountains still remain largely unaddressed in much of the HKH region. This is mainly because mountains form just small parts of big and influential countries like India and China in the HKH region, which also includes Nepal and Bhutan, where mountains characterize the countries” distinctiveness.

Only in the last few years, issues of mountains and mountain communities have started to draw the global attention. The ICIMOD-NPC conference on poverty and vulnerability in the HKH region, which was attended by representatives of 19 countries apart from international organizations and the United Nations (UN) committees, is just an example of the increased global interest on the agendas of sustainable mountain development.

Global warming, which scientists say is accelerating glacier melting in the Himalayas, has also contributed to the increasing global interest in mountain agendas. In its 2007 report that sparked controversy across the world, the Intergovernmental Panel for Climate Change (IPCC) had stated that the Himalayan glaciers could disappear by 2035 if the earth keeps warming up at the current rate. ´The IPCC may have got its mathematics wrong. However, it was right to highlight the threats to the Himalayan glaciers,´ said Phrang Roy, former Assistant President of International Fund for Agriculture Development (IFAD), who delivered a key note address at the ICIMOD-NPC conference.

Experts, including Dr Messerli, say sustainability of mountains is a key to addressing poverty especially in the wake of global warming. They also add that inclusive development and strengthening democracy at the grassroots levels, among other factors, are imperative to enable the mountain communities to deal with the severe impacts of climate change. ´These are some recommendations put forth by experts in our conference,´ said Dr Dhrupad Chaudhary, program manager at the ICIMOD. ´We hope countries in the HKH region will take up these recommendations in formulating their development agendas.´

Published on 2013-12-11 09:07:25

http://www.myrepublica.com/portal/index.php?action=news_details&news_id=65973

सिमट रहा झील का आंचल, पक्षी का कलरव भी मद्धिम

‘किये न पिअइछी जलवा हे पंडित ज्ञानी
नदिया किनार में गईया मर गइल
त मछली खोदी-खोदी खाई
किये न पिअइछी जलवा हे पंडित ज्ञानी’’
गांव-गंवई के ये बोल जब इन महिलाओं के कंठ से उतरकर पास के चौरों और नदियों के जल से तरंगित होती हैं तो झील का विहार करने वालों का यहां आना सार्थक हो जाता है। नदी, जल, मछली, पक्षी, चौर, झील जैसे शब्द भी यहां के लोक गीतों में पिरोया हुआ है। हम बात कर रहे हैं मिथिलांचल के मनोहारी चौरों-झीलों के मनोरम दृश्यों की, प्रवासी पक्षियों के सुंदर नजारों की, आसपास कलकल बहती नदियों की और इस बीच धिसट-धिसटकर सरकती जिंदगियों की।
यह है ‘कुशेश्वरस्थान पक्षी अभयारण्य’ । यह कई छोटे-छोटे चौरों की एक ऐसी ऋंखला है, जिसे लोग नरांच झील के नाम से भी जानते हैं। यह पक्षी विहार के लिए सर्वोत्तम जगह है। यहां गर्मी की विदाई के साथ मेहमान पक्षियों का आगमन शुरू हो जाता है। खासकर, साइबेरियाई पक्षियों के लिए दरभंगा जिले के कुशेश्वरस्थान प्रखंड का यह इलाका ससुराल से कम नहीं है। बिहार के अन्य प्रमुख झीलों की तरह यहां से विदेशी पक्षियों की रूसवाई पूरी तरह नहीं हुई है। शांत व शीतल जल में हजारों प्रवासी पक्षियों का कतारबदद्घ होकर भोजन व प्रजनन में मगर रहने और तरह-तरह की अदाओं से फिजाओं को गुलजार करने का दृश्य भला किन आंखों को नहीं भायेगा?
दरभंगा मुख्यालय से तकरीबन 45 किलोमीटर का सफर तय कर जब आप बेरि चौक पहुंचेंगे तो ‘कुशेश्वरस्थान पक्षी अभयारण्य’ का इलाका शुरू हो जाता है। निर्माणाधीन दरभंगा-कुशेश्वरस्थान नई रेल लाइन पार करते ही घुमावदार सोलिंग सड़क से होते हुए आगे बढ़ते ही दिखता है ऊबर-खाबड़ जमीन। कहीं जल से भरा तो कहीं सूखे खेत। दूर तक फैले जलकुंभी तो कहीं गेहूं के छोटे-छोटे, हरे-हरे पौधे। किसान मशगुल हैं रबी के फसल को सींचने में, तो बच्चे मशगुल हैं खेलने में। कहीं कुदाल चल रहा है तो कहीं क्रिक्रेट का बल्ला। झील का यह सूखा क्षेा भी कभी पानी से लबालब भरा रहता था, लेकिन पिछले कई सालों से यह झील रूठ गया लगता है। यहां खड़े पीपल के पेड़ गवाह हैं कि कभी इसका तना भी पानी में डूबा रहता था। आखिर इस झील और इसके प्रियतम निर्मल जल को क्या हो गया है? यहां आसपास रहने वाले लोगों को भी इसकी वजह मालूम नहीं।
5-6 चौर मिलकर यह विस्तृत क्षेा नरांच झील कहलाता है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, 6700 हेक्टेयर क्षेाफल में फैले ये चौर और 1400 हेक्टेयर लो लैंड का यह वृहत क्षेाफल वाला यह इलाका आज भले सिमट गया हो, लेकिन प्रवासी पक्षियों का अतिथि सत्कार कम नहीं हुआ है।
सहरसा जिले के मनगर गांव से सटा महरैला चौर, बिसरिया पंचायत से होकर बहती कमला नदी, विशुनपुर गांव का सुल्तानपुर चौर और कोसी नदी का स्नेह आज भी इस झील को जिंदा रखे हुए है। नाव पर चढ़कर जलकुंभी निकालती ये महिलाएं, घोंघा-सितुआ छानते बच्चे, केकड़ा पकड़ भोजन का जुगाड़ करते लोग और तितली नाम का यह जलीय पौधा। क्या यह सब कम है प्रवासी पक्षियों की मेहमाननवाजी के लिये !
कुशेश्वरस्थान पक्षी अभयारण्य। लगभग 15 दुर्लभ किस्म के प्रवासी पक्षियों का तीर्थ स्थल। लालसर, दिधौंच, मेल, नक्टा, गैरी, गगन, सिल्ली, अधनी, हरियाल, चाहा, करन, रत्वा, गैबर, हसुआ दाग जैसे मेहमान पक्षियों से गुलजार रहने वाला प्रकृति का रमणीक स्थान। जब यहां सैकड़ों-हजारों किलोमीटर दूर नेपाल, तिब्बत, भूटान, अफगानिस्तान, चीन, पाकिस्तान, मंगोलिया, साइबेरिया आदि देशों से ये रंग-बिरंगे पक्षी नवंबर में पहुंचते हैं तो पक्षी व प्रकृति प्रेमियों का मन खिल उठता है। चीड़ीमारों की भी बांछें खिल जाती हैं। रात के अंधेरे में ये चीड़ीमार इनका शिकार करने से नहीं चूकते हैं। हालांकि, कई बार ये पकड़े जाते हैं। झील के आसपास रहने वाले लोग बताते हैं कि अब प्रवासी पक्षियों का आना कम हो गया है । चीड़ीमार पानी में नशीली दवा डालकर पक्षी को बेहोश कर पकड़ लेते हैं। और इसे मारकर बड़े चाव से इसके मांस को खा जाते हैं। यहां के कई लोग इन पक्षियों का शिकार करते पकड़े गये और हवालात पहुंच गये। बहरहाल, पक्षियों का शिकार तो कमा है, लेकिन पानी के सिमटने से झील का आंचल छोटा हो गया है। इसकी पेटी में जहां कभी पानी भरा रहता था, वहां आज रबी फसल उगाये जा रहे हैं। जलीय जीवों, पौधों और मेहमान पक्षियों के घर-आंगन में गेहूं व सरसों के बीज प्रस्फुटित हो रहे हैं। गरमा धान की रोपनी के लिये बिचरा जमाया जा रहा है। पंपिंग सेट और ट्रैक्टर की आहट से मेहमान पक्षी आहत हैं। यहां चल रहे दो-दो पंपिंग सेट यह इंगित करने के लिये काफी हैं कि किस तरह झील और पक्षियों की पीड़ा से अनभिज्ञ किसान शेष बचे पानी को भी सोख लेना चाहते हैं। लिहाजा, इसमें इनका क्या दोषै? इन भोले-भाले किसानों को क्या मालूम कि प्रकृति के लिये पक्षी व जीव-जंतु कितना महत्वपूर्ण है। पर्यावरण के सेहत से इनका क्या सरोकार ? झोपड़ी में अपनी जिंद्गी की रात गुजारने वाले साधनहीन आबादी को पक्षी अभयारण्य की रक्षा का मां किसी ने दिया भी तो नहीं? हालांकि झील व प्रवासी पक्षियों के अस्तित्व को बचाने व लोगों को जागरूक करने के उद्देश्य से कभी यहां ‘रेड कारपेट डे’ मनाया जाता था। बॉटनी के एक प्रोफेसर डॉ एसके वर्मा की पहल पर ये कार्यक्रम दिसंबर में आयोजित होते थे, लेकिन यह सिलसिला कुछ साल चलकर थम गया। उद्घारक की बाट जोहता यह झील धीरे-धीरे वीरानी व उदासी की चादर ओढे चला जा रहा है। फिलवक्त किसी पर्यावरण व पक्षी प्रेमियों की आस में एक बार फिर ये पक्षी दूर-देश से यहां विचरण को आये हैं तो उम्मीद की एक किरण जगती है।
ज्यादा दिन नहीं गुजरे, जब ठंड के मौसम में हजारों प्रवासी पक्षियों का झूंड मन मोह लेता था। पक्षियों के कलरव से लोगों की नींद गायब हो जाती थी। मगर अब वो दिन कहां रहा। प्रकृति का गुस्सा, कोसी-कमला का बदलता मिजाज और चौरों में भर रहे गाद से झील बेहाल है। इसका असर पक्षियों के निवाले पर भी पड़ रहा है। ये फटी धरती और मृत पड़े घोंघा-सितुआ के ये अवशेष इस झील का दर्द बयां करने के लिये काफी हैं।
बताते चलें कि कुशेश्वरस्थान प्रखंड के जलजमाव वाले चौदह गांवों को नैसर्गिक, भूगर्भीय विशेषता और खासकर प्रवासी पक्षियों के लिये अनुकूल वातावरण के लिये इस झील को वाइल्ड लाइफ प्रोटेक्शन एक्ट 1972 (1991 में संशोधित) के तहत ‘कुशेश्वरस्थान पक्षी अभयारण्य’ घोषित किया गया। मिथिलांचल का यह इलाका पर्यटन के लिये भी खास स्थान रखता है। इस खासियत के चलते इस झील को खुशियों के दिन लौटाने होंगे। दुर्लभ किस्म के प्रवासी पक्षियों के मिटते अस्तित्व को बचाना होगा। प्राकृतिक जलस्त्रोतों, यथा-झील, चौर, नदी, नाला, बाबड़ी, पइनों को पुनजिर्वीत करना होगा। अन्यथा, हम अपने सहचर से बेबफाई के लिए दोषी होंगे। और तब हमारी जुबान भी इस गीत को शब्द देने में लड़खड़ायेगी कि
‘किये न पिअइछी जलवा हे पंडित ज्ञानी़़़़़

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Climate Refugee of Kutubdia Para Facing Crisis

published on:30/11/2013

Loss of life, land and poverties is rising very quickly at Cox’s Bazar district due to Climate changes. More than One lakh fifty thousand people of Cox’s Bazar have already been lost their home, home land, properties in the district during the last one hundred years. All the uprooted and landless people have already been migrated from their native village forever earlier. Those climate changes refugees have been taken shelter in different areas of the district and developed locality. More than forty thousand people of Kutubdia Island have already been taken shelter and build slams at Cox’s bazaar town. This slams is named `Kutubdia Para’ is situated on west side of Cox’s Bazar Air port.
Another ten thousand people of Kutubdia Island have already been taken shelter and build locality at Teknaf upazila named `Kutubdia para’ under hoykong union’. This migrant people facing several number of Socio economic crisis.see details

The India Problem

A powerful but unpredictable force is rising in the battle over the future of the climate. It’s the type of powerful force that’s felt when 1.2 billion people clamor for more electricity—many of them trying to light, heat, and refrigerate their ways out of poverty; others throwing rupees at excessive air conditioning and other newfound luxuries. And it’s the type of unpredictable force that’s felt when the government of those 1.2 billion is in election mode, clamoring for votes by brazenly blocking progress at international climate talks.

Hundreds of millions of Indians live in poverty, wielding a tiny per-person carbon footprint when compared with residents of the West and coming out on top of environmental sustainability surveys. But the country is home to so many people that steady economic growth is turning it into a climate-changing powerhouse. It has developed a gluttonous appetite for coal, one of the most climate-changing fuels and the source of nearly two-thirds of the country’s power. India recently overtook Russia to become the world’s third-biggest greenhouse gas polluter, behind China and the United States. (If you count the European Union as a single carbon-belching bloc, then India comes in fourth).

Continue reading at Slate … http://www.slate.com/articles/health_and_science/energy_around_the_world/2013/11/india_blocking_climate_talks_warsaw_bangkok_and_kyoto_negotiations.html?wpisrc=burger_bar

Impacts of climate change mount coastal people’s hardship

Syful Islam

The impacts of climate change are mounting hardship of Bangladesh’s coastal people where calamities like cyclones, tidal surge, and river bank erosion nowadays hitting in increased number.

People living in these coastal areas are considered as the most vulnerable to the climate change impacts. Most of the people living there are poor and some are at the extreme poor segment.

Two major cyclones — Sidr and Aila — which hit Bangladesh coasts in 2007 and in 2009, had destroyed roads and embankments, washed away homes, lives and livelihoods of hundreds of thousands of people. These extreme weather events which are considered as impacts of climate change have deepened the misery of coastal inhabitants.

Experts said agony of poor coastal people turned manifold as they are mainly dependent on natural resources for living and livelihoods. The calamities, when hit them, first damage the natural resources further weakening their strength.

With the impacts of climate change starting to be more visible day by day, scientists apprehend that a big portion of coastal areas of low-lying nations will be inundated because of sea level rise.

They said in Bangladesh a 10cm rise in sea level could inundate 2.0 per cent of arable lands by 2020 and 10 per cent lands by 2050 which may cause displacement of 15 million coastal residents.

Non-government organisations working in coastal districts estimate that nearly 5.0 million people living there are at high risk of either being displaced or experiencing extreme impacts of climate change in the near future.

Sea level rise

Sea level rise is a major concern for low lying nations including Bangladesh. Scientists blame manmade hazards for global warming which melts ice in the Himalayan and Antarctic. The incased volume of ice melting causes sea level rise which poses threat to existence of countries like Maldives and inundation of a big portion of Bangladesh territory.

The 2007 report of Intergovernmental Panel on Climate Change (IPCC) said a one-meter rise in sea levels may swamp 17 percent of Bangladeshi low lying areas and displace 20 million people by 2050.

A new scientific report released by the World Bank Group in June 2013 said among the South Asian nations Bangladesh will be most affected by an expected 2° Celsius temperature rise in the next decades. It said if temperature is up by 2.5 ° Celsius the flood areas in Bangladesh could increase by as much as 29 per cent.

The IPCC in its Fifth Assessment Report (released on September 27, 2013) projected that by 2100 the sea-level may rise by 28-98 cm, which is 50 per cent higher than the old projections of 18-59 cm when comparing the same emission level and time periods.

Livelihoods under severe threat

Hit by an increased number of disastrous events the lives and livelihoods of coastal people are under severe threat apart from loss of homes and lands. Especially, as saline water enters into the lands and ponds during cyclone and tidal surges, the lands lose their capacity to produce crops while sources of drinking water become polluted.

Due to excessive salinity in the lands, the farmers lose crops frequently which further weaken them financially alongside threatening food security. In most of the coastal districts farmers can produce rice once a year. When a farmer loses a crop once a year, he has no option but to strive with family members.

The other way of earning bread and butter for coastal people is fishing in the rivers and sea. But the increased numbers of cyclones and storms have strongly affected the profession as staying in the sea become highly risky for life while fishes are becoming unavailable day by day.

A study carried out by Campaign for Sustainable Rural Development (CSRL) found that in last 30 years the intensity and frequency of storms had increased by three times. During the 2007-2010 period Bangladesh has had 10 to 14 storms severe enough for a Signal No 3 warning.

Thirty years ago, just four or five such warnings were issued each year. This year the meteorological department also issued Signal No 3 warning for Bangladeshi river and sea ports in an increased number meaning that higher numbers of storms have formed this year compared to last year.

And when a Signal No 3 warning is issued, fishing trawlers in the sea are advised to return to the shore immediately meaning a loss of several thousands of taka in each trip.

Besides, the fishermen nowadays frequently talk about getting fewer numbers of fishes both in the sea and rivers. Many fishermen families starve both in off and peak seasons due to meagre earnings.

Lack of work triggers massive migration

The impacts of climate change are causing displacement of thousands of people from the coastal areas. The 1998 floods made 45 million people homeless while the cyclone Sidr displaced 650,000 in 2007, Aila 842,000 and Bijli 20,000 in 2009.
Failing to ensure livelihoods and losing living places, people from coastal districts are continuously migrating to nearest cities and towns as well as to the already overcrowded Dhaka. Estimations show that every year over half a million people pour into the capital majority of whom are believed to be climate migrants.

External migration is also taking place as many are forced to flee the country failing to repay the loans after losing everything to the river bank erosion and major cyclones. After cyclone Aila hit the area, around 50 per cent people of a village in Satkhira district left it, a handsome of them also migrated to neighbouring countries to secure a living.

In Southkhali union under Bagerhat district almost 30 per cent residents left the area for elsewhere after the cyclone Sidr struck it.

After reaching the cities these climate refugees start living in inhuman conditions in the slums in absence of civic facilities. These slum people suffer from various diseases and children living there suffer from malnutrition and lack of education.

They enter into the severely occupied job market but fail to ensure food for even twice a day. Many of them also start begging in the roadside, while some engage themselves in prostitution to earn foods and living.

Due to the increased number of migration, nowadays new makeshift rooms are being built in the slums everyday while some live in the street further raising public nuisance in the cities. These people, having no family planning measures, also cause baby boom in the already over-crowded urban areas.

http://greenbarta.com/index.php/climate-change/144-impacts-of-climate-change-mount-coastal-people’s-hardship.html

U.N.: Hurry up on climate action or we’re screwed!

World, don’t lose heart, but you really need to hustle.

That’s the message from the United Nations as international climate delegates prepare to launch into a new round of negotiations next week aimed at cutting global greenhouse gas emissions.

The world agreed in 2009 to limit global warming to 2 degrees Celsius, or 3.7 Fahrenheit, above preindustrial levels. But a report released Tuesday by the U.N. Environment Program reminds us that we’re not on track to meet that goal — not even close.

Even if all the pledges made to date by various governments to reduce their emissions are fulfilled, the report warns that temperature rise would still overshoot the 2-degree goal. That’s not to say it would be impossible to meet the goal, but a serious sense of urgency would be required.

Continue reading at Grist: http://grist.org/news/u-n-hurray-up-on-climate-action-or-were-screwed/