Climate change confuses Kashmir’s farmers

Faced with increasing frequency of droughts, and with irrigation facilities available to less than half the farms, rice farmers in Kashmir are wondering how to deal with water shortage.

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नदियों की मौत पर शोकगीत भी नहीं

  • संतोष सारंग

मानव सभ्यता का विकास नदियों के आसपास ही हुई है। नदियां हमारे लिए जीवनदायिनी स्वरूपा हैं। मनुष्य के अलावा अन्य प्राणियों, वनस्पतियों एवं इको सिस्टम के लिए भी जरूरी हैं। इसलिए तो नदियां प्राचीन काल से इतनी पूजनीय हैं। खासकर गंगा को मां का दर्जा देकर हम पूजते आ रहे हैं। पर, आज स्थिति उलट है। अविरल बहनेवाली नदियां रोकी जा रही हैं। नदी नाले में तब्दील होती जा रही है। निर्मल जल काला पानी में बदलता जा रहा है। नदियों की तलहटी में अपना संसार बसानेवाले जीव-जंतु भी मरते-मिटते जा रहे हैं। कहीं औद्योगिक कचरे से नदियों की सेहत बिगड़ रहा है, तो कहीं धार्मिक आस्था व मानवीय करतूतों से नदी मरती-मिटती जा रही हैं।
उार बिहार में आठ प्रमुख नदियां बहती हैं। ये हैं गंडक, बूढ़ी गंडक, बागमती, कोसी, कमला बलान, घाघरा, महानंदा, अधवारा समूह की नदियां। इन सभी नदियों का जल बिहार के बीचो-बीच से गुजरने वाली गंगा में समाहित हो जाती हैं। बूढ़ी गंडक को छोड़कर शेष सातों नदियां नेपाल से निकलती हैं। बूढ़ी गंडक का उद्गम पश्चिम चंपारण का एक चौर है। उार बिहार में इन बड़ी नदियों के अलावा दर्जनों छोटी-बड़ी नदियां बहती हैं, जो इस मैदानी इलाके की आर्थिक, सांस्कृतिक, सामाजिक समृद्घि में सहायक रही हैं। लेकिन दुर्भाग्यवश गत कई दशकों से ये नदियां बरसाती बन कर रह गयी हैं अथवा तिल-तिल कर मिटती जा रही हैं।
घाघरा नदी वैशाली जिले के लालगंज, भगवानपुर, हाजीपुर, देसरी, सहदेई प्रखंडों से गुजरती हुईं महनार प्रखंड में बाया नदी में मिलती है। आगे जाकर यह गंगा में मिल जाती है। यह नदी बिहार में कई जगह लुप्त दिखती है। पहले यह वैशाली जिले में सिंचाई व्यवस्था की रीढ़ थी। गंडक नदी से आवश्यक जल का वितरण होता था, जो इसके बहाव के पूरे क्षेत्र में हजारों एकड़ जमीन को सींचती थी। चंपारण, मुजफ्फरपुर, वैशाली, समस्तीपुर जिलों की जमीन की प्यास बुझाने वाली बाया नदी का हाल भी बुरा है। दशकों से उड़ाही न होने के कारण इसकी पेटी में गाद जमा हो गया है। गरमी में भी पानी सूख जाता है। किसानों के लिए वरदान रही बाया को पुनर्जीवित  करने के लिए वाया डैमेज योजना बनायी गयी, पर यह ठंडे बस्ते में पड़ी है। मुजफ्फरपुर जिले में कभी बलखाने वाली छोटी-छोटी नदियां माही, कदाने, नासी भी दम तोड़ चुकी हैं। कहीं-कहीं गड्ढे के रूप में नदी का निशान जरूर मिल जाता है।
चंपारण में भपसा, सोनभद्र, तमसा, सिकहरना, मसान, पंडई, ढोंगही, हरबोरा जैसी पहाड़ी नदियां बरसाती बनती जा रही हैं। प्रदूषण का बोझ ढोने को विवश हैं। सिल्टेशन की वजह से ये छिछला होती जा रही हैं। इनमें से कई नदियां खनन विभाग की उदासीनता व बालू माफियाओं के काले धंधे की शिकार हो रही हैं। इस इलाके में नदियों से अवैध ढंग से बालू की बेरोकटोक निकासी की जा रही है। सुतलाबे, सुमौसी, रघवा नदी भी अपनी पुरानी धारा के लिए तरस रही हैं। पूर्वी चंपारण के कल्याणपुर प्रखंड स्थित राजपुर मेला के पास सुमौसी नदी की तलहटी को मि?ी से घेर कर लोगों ने तालाब बना दिया है, जिसमें वे अस्थायी रूप से मत्स्यपालन करते हैं। केसरिया प्रखंड के फूलतकिया पुल के समीप यह नदी अतिक्रमित कर ली गयी है। झांझा नदी दिलावरपुर के पास पूरी तरह संकीर्ण हो गयी है। सीतामढ़ी में लखनदेई, लालबकेया, झीम नदी अब अविरल व निर्मल नहीं बहती हैं। लखनदेई (लक्ष्मणा) की धमनियों में सीतामढ़ी शहर का कचरा बह रहा है। इस नदी के किनारे जमीन अतिक्रमित कर लोग घर बना रहे हैं। रीगा चीनी मिल का कचरा मनुषमारा नदी को जहरीला बना रहा है। बीच-बीच में मनुषमारा, लखनदेई की उड़ाही के लिए आंदोलन भी होते रहते हैं, पर कुछ हुआ नहीं। बागमती के कार्यपालक अभियंता भीमशंकर राय ने बताया कि भारत-नेपाल सीमा के भारतीय इलाके में करीब 8 किलोमीटर में स्थानीय लोगों ने अतिक्रमण कर लखनदेई की पेट में घर बना लिया, जिस कारण उसकी धारा अवरूद्घ हो गयी है। ऐसे में नदी की उड़ाही करना मुश्किल हो रहा है। नदी के किनारे के गांवों में सिंचाई की समस्या उत्पन्न हो गयी है। जमुरा-झीम नदी की धारा मोड़ कर लखनदेई में मिलाने की योजना पर काम हो रहा है।
करहा, धौंस, जमुनी, बिग्छी आदि नदियां मिथिलांचल के किसानों, पशुपालकों के लिए अब उपयोगी नहीं रही। बिग्छी व जमुनी नेपाल स्थित सिगरेट व कागज की फैक्ट्रियों का रासायनिक अवशेष लेकर आती है और धौंस में मिला देती हैं। ये नदियां कालापानी की सजा भुगत रही हैं। इस नदी में स्नान करने का मतलब है चर्मरोग से ग्रसित हो जाना। कुछ साल पहले केंद्रीय जल आयोग की टीम आयी थी। टीम ने धौंस के पानी को अनुपयोगी बताया था। गत दो-तीन साल में अधवारा समूह की कई नदियों की धारा मर चुकी है। दरभंगा जिले में बहनेवाली करेह, बूढ़नद नदियों ने भी अपना प्राकृतिक प्रवाह खो दिया है। नदी विशेषज्ञ रंजीव कहते हैं कि विकास के अवैज्ञानिक मॉडल व जलवायु परिवर्तन के कारण नदियां मर रही हैं। हाल के दिनों में उार बिहार की नदियों में पानी की आवक कम हुई है। इसका कारण है कि गत एक दशक से हिमालय क्षेत्र में बारिश कम हुई है। बूढ़ी गंडक व बागमती नदी के पानी से बना प्रमुख प्राकृतिक झील कांवर झील भी सूख गया है। तालाब जैसा दिखता है। कोसी की सहायक नदियां तिलयुगा पर बांध बनाया गया है। जगह-जगह स्लूइस गेट लगाया गया। इस सिल्ट लोडेड नदी में स्लूइस गेट लगाने से उसकी धारा बदल गयी है। हमें नदियों के विज्ञान को समझना होगा। तभी विकास की रूपरेखा तय करनी होगी।
बागमती की बाई ओर सिपरी नदी कहलानेवाली धारा ‘फलकनी’ तथा ‘हिरम्मा’ गांवों के पास से अलग होकर दाहिनी धारा के समानांतर चलती हुई पूरे मुजफ्फरपुर जिले की पूर्वी सीमा तक बहती थी और दाहिने प्रवाह के साथ जिले की सीमा पर ‘हठा’ नामक गांव के पास मिलती थी, पर यह ‘सिपरी’ धारा भी अब प्राय: लुप्त हो चुकी है। 1970 में बागमती को इस धारा से बहाने का प्रयास किया गया, लेकिन सफलता नहीं मिली। सुलतानुपर भीम गांव के पास ही बागमती की एक प्राचीन ‘कोला’ नदी नामक उपधारा ‘सिपरी’ से मिलती थी। कोला नदी भी प्राय: लुप्त हो चुकी है।
उार बिहार की नदियों में सरयू के बाद पूर्व की ओर दूसरी बड़ी नदी गंडकी है, जिसे नारायणी भी कहते हैं। नेपाल के तराई क्षेत्र में इसे शालीग्राम भी कहा जाता है। यह नदी भी कहीं सिकुड़ गयी है, तो कहीं दूर चली गयी है। नारायणी के किनारे बसे गांव हुस्सेपुर परनी छपरा के युवा किसान पंकज सिंह बताते हैं कि पहले करीब डेढ़ किलामीटर चौड़ाई में नदी का पानी बहता था। अब तो यह नाले की तरह बह रही है। गाद भर गया है। कटाव के कारण हमारे घर के सामने यह नदी मुजफ्फरपुर से रूठ कर छपरा से बहने लगी है।
दरभंगा में एक संगोष्ठी में भाग लेने आये जलपुरुष राजेंद्र सिंह ने कहा कि सन् 1800 में ही ईस्ट इंडिया कंपनी के इंजीनियरों ने बिहार की नदियों के साथ अत्याचार प्रारंभ कर दिया था। इस इलाके के इको सिस्टम को समङो बिना ही पुल, पुलियों, कल्वटरें का निर्माण शुरू कर दिया गया। रेल की पटरियां बिछाने के लिए गलत तरीके से मि?ी की कटाई की गयी। इस कारण नदियों का नैसर्गिक प्रवाह प्रभावित हो गया। इस इलाके में पानी का कंटेंट तेजी से बदल रहा है, जो लोगों को बीमार भी बना रहा है। उन्होंने कहा कि पूरा इको सिस्टम जल पर आधारित होती है और एक समृद्घ इको सिस्टम में ही समृद्घ इकोनॉमी विकसित हो सकती है। जल संरक्षण की नीति बनानेवाले केंद्र व राज्य सरकार के अधिकारी यूपी व उारांचल की नदियों के हिसाब से नीतियां बनाते हैं, जो बिहार में सफल नहीं हो पाते हैं। जल संसाधन विभाग की कवायद भी बांध, बाढ़ व राहत कार्यक्रम तक सिमटी रहती हैं। नदियों के विज्ञान, उसकी सेहत व उसके पानी में पलने वाले जीव-जंतुओं के जीवन की चिंता न सरकार को है और न विभाग को। लिहाजा, जरूरत है कि लोग जीवनदायिनी नदियों को मरने से बचायें।

Ancient Kings Fight Climate Change – IPS

As erratic climate patterns take hold, researchers say that ancient  reservoirs built hundreds of years back, can serve to minimize flood waters and as receptacles for water during harsh droughts. http://www.ipsnews.net/2013/08/ancient-kings-fight-climate-change/

Could Sri Lanka get irrigation boost from ancient reservoirs? – IRIN

One way Sri Lanka can better manage its water resources in the face of changing monsoon patterns is through centuries-old water reservoirs, experts say.

Experts at the Colombo-based International Water Management Institute (IWMI) say one way to ease fluctuating rice harvests (due to increasingly erratic monsoon seasons) is to use thousands of ancient small irrigation reservoirs spread out in the Northern, North Central, Eastern, North Western and Southern provinces. – http://www.irinnews.org/report/98503/could-sri-lanka-get-irrigation-boost-from-ancient-reservoirs

Pakistan breaks India’s record mangroves plantation

By 
Lahore Times
Published: June 24, 2013

KETI BUNDER, Sindh: “The Sindh Forest Department has set a Guinness World Record for planting a maximum number of mangroves saplings at Keti Bunder” on Saturday (June 22), informed the Additional Secretary Sindh Forest and Wildlife Department, Mr. Aijaz Ahmed Nizamani at a press conference held here, in Keti Bunder, a coastal town in Sindh.

He was accompanied by Mr. Mahmood Akhtar Cheema, Country Representative, IUCN Pakistan; Mr. Riaz Ahmed Waggan, Chief Conservator of Forests and Mr. Muhammad Umer Memon, Project Director Sindh Coastal Community Development Project (SCCDP). Two independent adjudicators for the Guinness World Records event, Mr. Rafi-ul-Haq and Dr. Shaukat Hayat Khan also joined them, along with Mr. Tahir Qureshi, Coastal Ecosystem Expert, IUCN Pakistan.

The announcement was made, shortly after 300 coastal community volunteers had planted 8,47,257 saplings, breaking an earlier record of 6,11,000 saplings planted by India in 2010. While congratulating the nation, he thanked the forest department employees, coastal community volunteers and the coastal experts for their tireless efforts in achieving this goal.

He also informed the media that the Asian Development Bank has announced Rs.5,000 as a special reward for each of the volunteer. ADB has funded a 5-year long Sindh Coastal Community Development Project in the area in partnership with the Sindh Forest Department. A special shield was awarded to Mr. Tahir Qureshi for his exceptional conservation work in the Indus Delta over the last few years.

While congratulating the efforts of the Sindh Forest Department, Mr. Mahmood Akhtar Cheema said that there have been competitions between Pakistan and Indian in sports but a competition in the field of environment is even healthier, as in the end it will only lead to healthy ecology in both the countries.

Weblink: The Lahore Times Read more: http://www.lhrtimes.com/2013/06/24/pakistan-makes-world-record-by-planting-847275-mangrove-saplings-in-a-day-174792/#ixzz2ZCUKpgDs
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Early warning technology protects Nepali villagers from sudden floods

The Phulping bridge crosses the Bhote Koshi River in Jhirpu Phulpingkatti, a village near Nepal’s border with China. It replaced an old stone bridge, remnants of which can be seen to the left, which was washed away in the floods of 1981. THOMSON REUTERS FOUNDATION/Saleem Shaikh

Thomson Reuters Foundation – Wed, 22 May 2013 10:45 AM
Saleem Shaikh

JHIRPU PHULPINGKATTI, Nepal (Thomson Reuters Foundation) – For years, Deepa Newar and her neighbours lived with the fear that their livelihoods – and even their lives – might be swept away without warning.

Newar and her fellow residents of Jhirpu Phulpingkatti, a village some 112 km (70 miles) northeast of Kathmandu, Nepal’s capital, live perched on the bank of the Bhote Koshi River. The river is prone to sudden, devastating floods that can swamp fields, carry away livestock and even kill those who do not manage to flee to higher ground.

The 2.5 acres (1 hectare) of land on which Newar cultivates paddy rice and maize have suffered severe flooding four times in the last 32 years, most recently in 2011.

Looking at the swirling grey waters of the river that flows into Nepal across the border with China’s Tibet Autonomous Region, 10 km (6 miles) upstream, the 39-year-old recalls those disasters.

“(The river) left behind a trail of death and destruction whenever it has turned into a monster,” she says.

But Newar now enjoys a sense of safety for herself and her family, thanks to an early warning system for floods installed by the Bhote Koshi Power Company (BKPC) at its hydropower plant on the river.

GLACIAL LAKE THREAT

Flash floods can be caused by severe storms or the failure of levees, but the Bhote Khosi River is also susceptible to glacial lake outburst floods. These result from the catastrophic failure of a natural dam high in the mountains that contains glacial meltwater. Such failures are becoming a greater risk as warming temperatures linked to climate change lead to faster glacial melt and greater volumes of water in the lakes.

The Bhote Khosi river basin covers an area of about 3,400 square km (1,300 square miles) and has an estimated 150 glaciers. Of its 139 glacial lakes, whose area totals some 16 square km (6 square miles), 59 are highly vulnerable to outbursts, according to a study conducted by the International Centre for Integrated Mountain Development (ICIMOD), an intergovernmental body of eight countries in the Hindu Kush-Himalaya region, including Nepal and China.

In 1981, a glacial lake outburst flood in the river basin washed away several bridges, including the China-Nepal Friendship Bridge along the Araniko Highway, said Pradeep K. Mool, a glaciologist at ICIMOD in Kathmandu.

Until 2010, floods could strike the villages with no warning. Residents had virtually no time to move to higher ground and were forced to leave behind their livestock and crops, suffering financial losses as well as emotional distress.

“Before the advent of the warning system … we were at risk of being washed away,” said Newar.

Janak Raj Pant, maintenance manager at the Bhote Koshi power plant, said that the river is subject to erratic flows, particularly during the monsoon. For this reason, the power company arranged for the early warning system to be installed in 2010 to benefit the downstream communities in Sindhupalchowk district.

5 TO 8 MINUTES WARNING

The early warning system gives villagers 5-8 minutes’ notice of a flood – just enough time to save themselves.

Five flood sensors are positioned near the Nepal-China Friendship Bridge, about 6 km upstream from the power station.

If the water in the river reaches a dangerous level, the sensors activate sirens placed at four locations, including one at the power plant. The sirens warn the communities to flee to higher ground. Residents use their mobile phones to warn other villages further downstream.

According to Pant, a glacial lake outburst flood takes about five minutes to travel from the Nepal-China Friendship Bridge to the plant. He says lives can be saved if people respond to the alarm immediately.

“At present, the warning system can make the sirens blare five minutes before any flood can strike any of the 79 downstream villages of Sindhupalchowk district,” said Pant, standing beneath the red siren mounted on a side wall of the company’s building.

According to Pant, it is not currently possible to give more warning because information on flooding is not available from the Chinese side of the border.

About 40 percent of the Bhote Koshi river basin is in Nepal, with the remaining 60 percent in China.

Other residents of Jhirpu Phulpingkatti agree that the system has given them a sense of security, but they would like the lead time given by the alarm to be extended.

More sensors need to be placed further upstream within Nepal, especially at glacier snouts and where glacial lakes have formed or are forming, commented Joydeep Gupta, a New Delhi-based journalist and expert on South Asia river basins and flood warning systems.

NEED FOR CHINESE HELP

The ICIMOD study shows that Nepal has experienced at least 24 glacial lake outburst floods. Of these, 14 are believed to have occurred in Nepal itself, and 10 were the result of flood surge overspills from the Chinese side of the border. According to data from the Nepal Meteorological Department, such floods occur on average once every three years in Nepal.

The glaciers in the Hindu Kush-Himalayas are retreating, which scientists believe is the result of climate warming. As glaciers melt, the water released into lakes can build pressure on the natural dams and increase the risk of an outburst flood.

“We have already sought proposals from interested firms to expand the warning system to other vulnerable districts (near) the Bhote Koshi River,” said Pant. “It is hoped that in coming months we should be able to install alarm systems in as many districts as possible.”

“(The) Nepali government should also replicate and establish such early warning systems at all streams to (avoid) or reduce loss of lives or damage,” said Gupta.

But priority should be given to the streams emanating from the unstable glacier lakes identified by ICIMOD in its recent study, he emphasised. According to Gupta, China, as the upstream country, should collaborate with Nepal to share information about flash floods or glacial lake outburst floods hours before they reach the Nepali border, to allow maximum time for warnings to vulnerable downstream communities.

“Any viable information-sharing system by which Chinese officials can pre-inform their Nepali counterparts of any risk of flash flood or (glacial lake outburst flood) would be very helpful. A similar system between China and India already saved many lives in a flash flood in the Sutlej river area a few years ago,” he said.

Saleem Shaikh is a climate change and development reporter based in Islamabad.

Weblink: http://www.trust.org/item/20130522093446-pfy20/

बिहार में तटबंध का खेल

  • संतोष सारंग

बिहार की एक बड़ी आबादी अभी से बाढ़ को लेकर सशंकित है। मात्र एक महीना शेष रह गया है, जब बाढ़ दस्तक देना शुरू करेगा। यहां के लोगों के लिए हर साल बागमती, कोसी, कमला बलान, गंडक, बूढ़ी गंडक, घाघरा, महानंदा, अधवारा समूह की नदियां तबाही लाती है। कुल मिलाकर राज्य के 38 में से 28 जिले बाढ़ से प्रभावित होते हैं। अकेली कोसी सहरसा, सुपौल, मधेपुरा, पूर्णिया, अररिया, खगड़िया, कटिहार, मधुबनी समेत 10 जिलों को अपनी चपेट में लेकर करीब 4 महीने तक तांडव करती हैं। राज्य में गंगा के उारी हिस्से का करीब 70 फीसदी हिस्से को पानी में डूबना पड़ता है। बाढ़ को नियंत्रित करने के लिए सरकार कई उपाय करती हैं, फिर भी बाढ़ का पानी अपना रौद्र रूप दिखाती रही है। तटबंध भी बांढ़ को नियंत्रित करने में कारगर सिद्घ नहीं हो पायी है। कोसी तटबंध 1963 से लेकर अबतक 2008 तक दर्जनों बार टूट चुकी हैं। इस अवधि में हजारों परिवार उजड़ गये। लाखों लोग तबाह हुए। जानमाल की क्षति हुई।
राज्य को बाढ़ की विभीषिका से बचाने के लिए सरकार तटबंधों का निर्माण एवं मरम्मत का काम कराती रही है। हाल की स्थ्िित यह है कि सूबे में तटबंध निर्माण का काम धीमा चल रहा है। जल संसाधन विभाग द्वारा चयनित 407 योजनाओं में अब तक 228 योजनाओं का काम आधा भी पूरा नहीं हो सका है। बाढ़ से पूर्व इन योजनाओं का काम पूरा होना संभव नहीं दिखता। इस वर्ष कुल 407 योजनाओं का चयन किया गया, जिस पर 985 करोड़ रुपये खर्च होना था। इन योजनाओं पर एक जनवरी से काम शुरू हुआ, लेकिन सुस्त चाल की वजह से योजनाओं पर मंथर गति से काम चल रहा है। पूर्णिया में 73, गया में 17, सीवान में 34, समस्तीपुर में 87, मुजफ्फरपुर में 33, वाल्मीकिनगर में 48, डेहरी में 19, वीरपुर में 66, भागलपुर में 12 व पटना चीफ इंजीनियर के अधीन 18 योजनाओं पर काम चल रहा है। 31 मई तक योजनाओं को पूरा करना है। 15 जून से बाढ़ की अवधि शुरू हो जाती है। तय समय में यदि काम पूरा नहीं हुआ, तो बरसात में काम करना मुश्किल होगा। ऐसी स्थिति में बाढ़ग्रस्त 28 जिलों के लिए कई मुश्किलें खड़ी हो सकती हैं।
बिहार में डैम के नाम पर सालाना करोड़ों रुपये सरकारी खजाने से खर्च की जाती है, फिर भी बाढ़ से निजात नहीं मिल रही है। तटबंध मरम्मत का खेल लोग समझ नहीं पा रहे हैं। गत 22 वर्षों में 2752़63 करोड़ रुपये खर्च किये गये और इसी अवधि में तटबंध टूटने की 268 घटनाएं हुईं। 1987 से लेकर 2011 तक राज्य की नदियों पर बने तटबंध 371 बार टूट चुके हैं। इसके बावजूट सूबे की सरकार बाढ़ से स्थायी समाधान निकालने के बजाय तटबंधों की मरम्मत पर ही जोर देती रही है। बिहार में अभी 3649 किमी तटबंध है। अगले पांच साल में 1676 किलोमीटर और तटबंध बनाने की योजना है। विभाग का दावा है कि इससे लगभग 26़86 लाख हेक्टेयर क्षेत्र को बाढ़ से सुरक्षित रखा जायेगा।
पर्यावरणविद् अनिल प्रकाश कहते हैं कि मुजफ्फरपुर जिले के औराई, कटरा, गायघाट एवं दरभंगा के करीब 120 गांव बागमती पर बांध बनने के कारण डूब जायेंगे। बागमती नदी के जिन-जिन हिस्सों में डैम बन गये, वहां के लोग उजड़ गये। पुनर्वास का इंतजाम नहीं हुआ। जमीन के बदले जमीन भी नहीं मिली। बांध के अंदर के खेत बालू से भर गये। जहरीले घास, गुड़हन आदि उग गये। बनैया सूअर, नीलगाय आदि का वास हो गया, जो फसलों को चट कर जाते हैं। तटबंध के बाहर भी जलजमाव होने लगा। मनुषमारा, लखनदेई आदि सहायक नदियों के पानी का निकास बंद हो जाने के कारण जलजमाव की समस्या उत्पन्न हो गयी है। बागमती क्षेत्र के शिवहर, सीतामढ़ी, मुजफ्फरपुर, समस्तीपुर, दरभंगा, सुपौल, खगड़िया आदि जिलों के सैकड़ों गांव काला पानी में तब्दील होते जा रहे हैं। पहले हर साल बागमती 12 किलोमीटर की चौड़ाई में उपजाऊ मिट्टी बिछा देती थी। लोग खुशहाल थे, लेकिन जबसे इस नदी को तटबंधों के माध्यम से तीन किलोमीटर के दायरे में कैद करने का सिलसिला शुरू ंहुआ, राज्य से पलायन तेज हो गया। इतना के बाद भी तटबंध निर्माण का काम जारी है। बागमती इलाके के सैकड़ों लोग बांध का विरोध करते हुए आंदोलन चला रहे हैं। सीतामढ़ी में संघर्ष यात्र के नेतृत्व में तो मुजफ्फरपुर में बागमती बचाओ अभ्यिान, बिहार शोध संवाद के नेतृत्व में आंदोलन चल रहे हैं। आंदोलनकारी बांध बनाने का विरोध कर रहे हैं।
नदी व बाढ़ विशेषज्ञ डॉ दिनेश कुमार मिश्र का तर्क है कि तटबंध बांध कर नदियों को नियंत्रित करने के बदले सरकार इसके पानी को निर्बाध रूप से निकासी की व्यवस्था करें। तटबंध पानी की निकासी को प्रभावित करता है। सीतामढ़ी जिले में बागमती पर सबसे पहला तटबंध बनने से मसहा आलम गांव प्रभावित हुआ था। उस गांव के 400 परिवारों को अबतक पुनर्वास का लाभ नहीं मिला है। रून्नीसैदपुर से शिवनगर तक के 1600 परिवार पुनर्वास के लाभ के लिए भटक रहे हैं। दोनों तटबंधों के बीच गाद भरने की भी एक बड़ी समस्या है। रक्सिया में तटबंध के बीच एक 16 फीट ऊंचा टीला था, जो अब यह बालू में दबकर मात्र तीन फीट बचा है। उधर, झंझारपुर के इलाके में कमला बलान का स्लुइस गेट मिट्टी से भर गया है। बागमती व कमला में सिलटेशन की दर अधिक है। इसकी वजह से बागमती बार-बार अपनी धारा बदलती है। इसे बांध कर कभी बाढ़ को नियंत्रित नहीं कर सकते हैं।
बांध समर्थक लॉबी के अपने तर्क हैं। सरकार, इंजीनियर, ठेकेदार बाढ़ नियंत्रण के लिए तटबंध को ही समाधान मानते हैं। जबकि बांध विरोधियों के अपने तर्क हैं। बांध विरोधी लॉबी का दावा है कि इंजीनियर जो आंकड़े पेश करते हैं, वे झूठे होते हैं।
मुजफ्फरपुर जिले के गायघाट प्रखंड के बंसघा गांव के रौदी पंडित अपनी पीड़ा बयां करते हुए कहते हैं कि तटबंध बनने से तटबंध के बाहर की जमीन की दर दो लाख प्रति कट्ठा हो गया है, जबकि भीतर की जमीन 15 हजार रुपये प्रति कट्ठा हो गया है। गंगिया, कटरा के रंजन कुमार सिंह कहते हैं कि अभी हमलोग जमींदार हैं। तटबंध बनने से हमलोग कंगाल हो जायेंगे। तटबंध के भीतर मेरा 10 एकड़ जमीन आ जायेगा। हम बर्बाद हो जायेंगे।