जलवायु का कहर मड़ूवा-कोदो पर

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ग्रामीण लोक कथाओं  में रोहा नामका एक हट्टा-कट्टा किसान हुआ था। उसका नाम रोहा था। कहा जाता है कि किसी फौजदारी मामले में वह जेल चला गया। इसी बीच आषाढ का महीना आया और इस महीने का आया रोहिणी नक्षत्र। इस नक्षत्र में जेल के सीखचों से बाहर हो रही बारिश को देखकर उस रोहा की अचानक आह निकल गयी। उसके मुंह से अनायास निकल पड़ा- ‘हाय रोहिणी, घर रोहा न रहा।’ ग्रामीण और किसान समाज में खेती को लेकर जो कुछ कहावतें प्रचलित रही हैं, उनमें इसे भी किसान बड़े चाव से कहा-सुना करते हैं। असल में हुआ यह था कि रोहा रोहिणी नक्षत्र में अपने खेतों में हर साल मड़ूवा की रोपनी करता था। यह मड़वा उसके पूरे परिवार के लिए साल भर के भोजन का आधार हुआ करता था। सो इस साल वह घर पर नहीं था और मड़ूवा न रोप पाने का उसका मलाल उसके साल भर के परिवार के भरण-पोषण का साधन छूट जाने को लेकर था। लोक कथा के अनुसार, जेलर ने उसकी व्यग्रता के बारे में पूछा तो रोहा ने अपनी व्यथा बताई। दयालु जेलर ने उसे मड़ूवा रोपने के लिए पेरोल पर छोड़ने की व्यवस्था करा दी। जब उसका रोहिणी में लगाया मड़ूवा कुछ बड़ा हुआ तो हाथी भी सूंड से उस पौधे के  झुंड को नहीं उखाड़ पाया।

अपने इलाके यानी, उत्तर बिहार में बड़े-बुजुर्गो से सुना है कि मुफलिसी में मड़वा सहारा होता है। यानि मड़वा के पुआल को लोग संजोकर रखते थे। बरसात के समय या ऐसे ही दुर्दिन में जब गांव-गिराम के गरीब लोगों के पास अनाज की कमी हो जाती थी, तो इसी पुआल को मसला जाता था। कहा जाता है कि मड़ूवा गरीबों का ऐसा सहारा था और ऐसा विश्वासी साथी कि इस पुआल से कुछ न कुछ मड़ूवा निकल ही आता था। लेकिन आज 20 साल की हो चुकी पीढ़ी में मड़वा की रोटी खाने की बात को दूर, शायद ही इस अनाज को किसी देखा भी हो।

इसी तरह का हाल परंपरागत रूप से पाए जानेवाले अनाजों का भी है। इन्हें आम तौर पर मोटा अनाज कहा जाता है। इन अनाजों में समां, कोदो, चीना, कउनी, आदि आते हैं। इनसे रोटी और भात बनाए जाते थे। खाने में भी इनका स्वाद कमाल का होता था। लेकिन अब इन अनाजों के दर्शन दुर्लभ हो गए हैं। पुरानी पीढ़ी के जिन लोगों ने इन अनाजों के स्वाद चख रखे हैं, आज वे इसका स्मरण कर लार टपकाते पाए जाते हैं।

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