बिहार में तटबंध का खेल

  • संतोष सारंग

बिहार की एक बड़ी आबादी अभी से बाढ़ को लेकर सशंकित है। मात्र एक महीना शेष रह गया है, जब बाढ़ दस्तक देना शुरू करेगा। यहां के लोगों के लिए हर साल बागमती, कोसी, कमला बलान, गंडक, बूढ़ी गंडक, घाघरा, महानंदा, अधवारा समूह की नदियां तबाही लाती है। कुल मिलाकर राज्य के 38 में से 28 जिले बाढ़ से प्रभावित होते हैं। अकेली कोसी सहरसा, सुपौल, मधेपुरा, पूर्णिया, अररिया, खगड़िया, कटिहार, मधुबनी समेत 10 जिलों को अपनी चपेट में लेकर करीब 4 महीने तक तांडव करती हैं। राज्य में गंगा के उारी हिस्से का करीब 70 फीसदी हिस्से को पानी में डूबना पड़ता है। बाढ़ को नियंत्रित करने के लिए सरकार कई उपाय करती हैं, फिर भी बाढ़ का पानी अपना रौद्र रूप दिखाती रही है। तटबंध भी बांढ़ को नियंत्रित करने में कारगर सिद्घ नहीं हो पायी है। कोसी तटबंध 1963 से लेकर अबतक 2008 तक दर्जनों बार टूट चुकी हैं। इस अवधि में हजारों परिवार उजड़ गये। लाखों लोग तबाह हुए। जानमाल की क्षति हुई।
राज्य को बाढ़ की विभीषिका से बचाने के लिए सरकार तटबंधों का निर्माण एवं मरम्मत का काम कराती रही है। हाल की स्थ्िित यह है कि सूबे में तटबंध निर्माण का काम धीमा चल रहा है। जल संसाधन विभाग द्वारा चयनित 407 योजनाओं में अब तक 228 योजनाओं का काम आधा भी पूरा नहीं हो सका है। बाढ़ से पूर्व इन योजनाओं का काम पूरा होना संभव नहीं दिखता। इस वर्ष कुल 407 योजनाओं का चयन किया गया, जिस पर 985 करोड़ रुपये खर्च होना था। इन योजनाओं पर एक जनवरी से काम शुरू हुआ, लेकिन सुस्त चाल की वजह से योजनाओं पर मंथर गति से काम चल रहा है। पूर्णिया में 73, गया में 17, सीवान में 34, समस्तीपुर में 87, मुजफ्फरपुर में 33, वाल्मीकिनगर में 48, डेहरी में 19, वीरपुर में 66, भागलपुर में 12 व पटना चीफ इंजीनियर के अधीन 18 योजनाओं पर काम चल रहा है। 31 मई तक योजनाओं को पूरा करना है। 15 जून से बाढ़ की अवधि शुरू हो जाती है। तय समय में यदि काम पूरा नहीं हुआ, तो बरसात में काम करना मुश्किल होगा। ऐसी स्थिति में बाढ़ग्रस्त 28 जिलों के लिए कई मुश्किलें खड़ी हो सकती हैं।
बिहार में डैम के नाम पर सालाना करोड़ों रुपये सरकारी खजाने से खर्च की जाती है, फिर भी बाढ़ से निजात नहीं मिल रही है। तटबंध मरम्मत का खेल लोग समझ नहीं पा रहे हैं। गत 22 वर्षों में 2752़63 करोड़ रुपये खर्च किये गये और इसी अवधि में तटबंध टूटने की 268 घटनाएं हुईं। 1987 से लेकर 2011 तक राज्य की नदियों पर बने तटबंध 371 बार टूट चुके हैं। इसके बावजूट सूबे की सरकार बाढ़ से स्थायी समाधान निकालने के बजाय तटबंधों की मरम्मत पर ही जोर देती रही है। बिहार में अभी 3649 किमी तटबंध है। अगले पांच साल में 1676 किलोमीटर और तटबंध बनाने की योजना है। विभाग का दावा है कि इससे लगभग 26़86 लाख हेक्टेयर क्षेत्र को बाढ़ से सुरक्षित रखा जायेगा।
पर्यावरणविद् अनिल प्रकाश कहते हैं कि मुजफ्फरपुर जिले के औराई, कटरा, गायघाट एवं दरभंगा के करीब 120 गांव बागमती पर बांध बनने के कारण डूब जायेंगे। बागमती नदी के जिन-जिन हिस्सों में डैम बन गये, वहां के लोग उजड़ गये। पुनर्वास का इंतजाम नहीं हुआ। जमीन के बदले जमीन भी नहीं मिली। बांध के अंदर के खेत बालू से भर गये। जहरीले घास, गुड़हन आदि उग गये। बनैया सूअर, नीलगाय आदि का वास हो गया, जो फसलों को चट कर जाते हैं। तटबंध के बाहर भी जलजमाव होने लगा। मनुषमारा, लखनदेई आदि सहायक नदियों के पानी का निकास बंद हो जाने के कारण जलजमाव की समस्या उत्पन्न हो गयी है। बागमती क्षेत्र के शिवहर, सीतामढ़ी, मुजफ्फरपुर, समस्तीपुर, दरभंगा, सुपौल, खगड़िया आदि जिलों के सैकड़ों गांव काला पानी में तब्दील होते जा रहे हैं। पहले हर साल बागमती 12 किलोमीटर की चौड़ाई में उपजाऊ मिट्टी बिछा देती थी। लोग खुशहाल थे, लेकिन जबसे इस नदी को तटबंधों के माध्यम से तीन किलोमीटर के दायरे में कैद करने का सिलसिला शुरू ंहुआ, राज्य से पलायन तेज हो गया। इतना के बाद भी तटबंध निर्माण का काम जारी है। बागमती इलाके के सैकड़ों लोग बांध का विरोध करते हुए आंदोलन चला रहे हैं। सीतामढ़ी में संघर्ष यात्र के नेतृत्व में तो मुजफ्फरपुर में बागमती बचाओ अभ्यिान, बिहार शोध संवाद के नेतृत्व में आंदोलन चल रहे हैं। आंदोलनकारी बांध बनाने का विरोध कर रहे हैं।
नदी व बाढ़ विशेषज्ञ डॉ दिनेश कुमार मिश्र का तर्क है कि तटबंध बांध कर नदियों को नियंत्रित करने के बदले सरकार इसके पानी को निर्बाध रूप से निकासी की व्यवस्था करें। तटबंध पानी की निकासी को प्रभावित करता है। सीतामढ़ी जिले में बागमती पर सबसे पहला तटबंध बनने से मसहा आलम गांव प्रभावित हुआ था। उस गांव के 400 परिवारों को अबतक पुनर्वास का लाभ नहीं मिला है। रून्नीसैदपुर से शिवनगर तक के 1600 परिवार पुनर्वास के लाभ के लिए भटक रहे हैं। दोनों तटबंधों के बीच गाद भरने की भी एक बड़ी समस्या है। रक्सिया में तटबंध के बीच एक 16 फीट ऊंचा टीला था, जो अब यह बालू में दबकर मात्र तीन फीट बचा है। उधर, झंझारपुर के इलाके में कमला बलान का स्लुइस गेट मिट्टी से भर गया है। बागमती व कमला में सिलटेशन की दर अधिक है। इसकी वजह से बागमती बार-बार अपनी धारा बदलती है। इसे बांध कर कभी बाढ़ को नियंत्रित नहीं कर सकते हैं।
बांध समर्थक लॉबी के अपने तर्क हैं। सरकार, इंजीनियर, ठेकेदार बाढ़ नियंत्रण के लिए तटबंध को ही समाधान मानते हैं। जबकि बांध विरोधियों के अपने तर्क हैं। बांध विरोधी लॉबी का दावा है कि इंजीनियर जो आंकड़े पेश करते हैं, वे झूठे होते हैं।
मुजफ्फरपुर जिले के गायघाट प्रखंड के बंसघा गांव के रौदी पंडित अपनी पीड़ा बयां करते हुए कहते हैं कि तटबंध बनने से तटबंध के बाहर की जमीन की दर दो लाख प्रति कट्ठा हो गया है, जबकि भीतर की जमीन 15 हजार रुपये प्रति कट्ठा हो गया है। गंगिया, कटरा के रंजन कुमार सिंह कहते हैं कि अभी हमलोग जमींदार हैं। तटबंध बनने से हमलोग कंगाल हो जायेंगे। तटबंध के भीतर मेरा 10 एकड़ जमीन आ जायेगा। हम बर्बाद हो जायेंगे।

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