Almost a quarter of Indians feel climate change impact: report

[Posted in Nature India on May 28, 2013.

Full report: http://www.nature.com/nindia/2013/130528/full/nindia.2013.68.html]

Subhra Priyadarshini

Almost a quarter of India might be personally experiencing the impacts of climate change, if a new study by Yale University in the US is to be believed. And about 16% of the country might never have heard of climate change, according to the same study.

A research team from the Yale Project on Climate Change Communication in collaboration with a couple of groups based in India conducted a representative national survey of 4,031 Indian adults — urban and rural — to investigate the current state of public climate change awareness, beliefs, attitudes, policy support and behaviours. The survey also noted public observations of changes in local weather and climate patterns and people’s self-reported vulnerability to extreme weather events.

The team led by Anthony Leiserowitz of Yale University reports that ‘the experienced’ (at 24%) form the largest group emerging out of those surveyed. They might not know too much about climate change but are convinced that it is happening and is a serious problem. This is partly because they have personally experienced the impacts more than any other group, according to the report made public this month (May, 2013).

The survey, carried out in November and December of 2011, found six distinct audiences within the Indian public that responded to the issue of climate change in very different ways. The Yale group divides them into: the experienced (24%), the informed (19%), the disengaged (16%) the undecided (15%), the unconcerned (15%) and the indifferent (11%).

While the ‘informed’ group is the most aware and convinced of the danger of climate change and highly supportive of national actions to mitigate the threat, the ‘undecided’, ‘unconcerned’ and ‘indifferent’ represent different stages of understanding and acceptance of the problem.

The ‘disengaged’, however, were found to have never heard of climate change and had no opinion about it, even when the phenomenon was described to them.

Leiserowitz says the report provides fodder for public climate change communication and interventions which must recognise that people are different and have different reasons for acting or not acting to reduce greenhouse gas emissions and prepare for the impacts of climate change.

The report builds on findings of another such survey by the team that looked at the global warming knowledge of Indians, their risk perceptions, personal involvement, and support for national action.

The team says though the representative findings cannot reflect the full diversity and complexity of Indian society, they do categorise the different audiences within the Indian public that respond to the specific threat of climate change in very different, yet patterned ways.

Fears Grow of a Himalayan Tsunami as Glaciers Melt – TIME

While attending the 2013 PANOS South Asia Climate Change Fellowship in Nepal last month, I was quite intrigued by the possibility of a ‘Himalayan Tsunami’. Having experienced the 2004 Asian Tsunami at dangerously close quarters, I wanted to pursue this straight out of hell disaster risk. Here is the resultant story that I did for TIME –  http://world.time.com/2013/05/27/fears-grow-of-a-himalayan-tsunami-as-glaciers-melt/

पर्यावरण को समर्पित दो अनोखी शादियां

पेड-पौधों के बिना प्रकृति व प्राणियों के जीवन की कल्पना नहीं की जा सकती। वृक्ष हमें फल-फूल व जीने के लिए ऑक्सीजन ही नहीं देते हैं, बल्कि वायुमंडल को स्वच्छ व प्रकृति को संतुलित भी करते हैं। इसी महा के कारण हमारे पूर्वजों ने पेडों की पूजा करने, सेवा करने की पंरपरा शुरू की थी। धार्मिक आयोजनों, रस्मों-रिवाजों, पर्व-त्योहा

Plantation on the marriage ceremony in Sasaram district, Bihar

रों से जोड़ कर पेड़-पौधों के प्रति आस्था व स्नेह पैदा किया। पीपल के पेड़ की जड़ में जल चढ़ाने, शादी के मौके पर आम व महुआ की शादी करने, तुलसी की पूजा करने, आंवले के पेड़ के नीचे खिचड़ी बना कर खाने जैसी दर्जनों परंपराएं पर्यावरण के हित में चलती आ रही हैं। हाल के दशकों में शहरीकरण, सड़कों के विस्तारीकरण, विकास के विनाशकारी मॉडल, भोगवादी प्रवृति के कारण हम अपनी अनूठी परंपरा को भूलते जा रहे हैं। पेड़ों की अंधाधुंध कटाई करने में तुले हैं। नतीजा सामने है। धरती तपने लगी है, तो सूरज भी भीषण गरमी पैदा कर रहा है। पारा 48 डिग्री सेल्सियस पार गया है। जलवायु परिवर्तन के कारण कई संकट पैदा होने लगे हैं। ग्लोबल वार्मिंग ने दुनिया की चिंता बढ़ा दी है। यह चिंता दुनियाभर की सरकारों, गैरसरकारी संस्थाओं की ही नहीं है। धरती के बढ़ते संकट को देखते हुए पर्यावरण को संरक्षित कर

Plantation on the occassion of marriage ceremony in Samastipur, Bihar

ने की जवाबदेही जन-जन की है।

हालांकि, इस दिशा में स्थानीय स्तर पर भी कुछ पहल हो रही है, जो उम्मीदें जगाती हैं। इसी महीने बिहार में हुईं दो अनोखी शादियां चर्चा में रहीं। वर व वधु पक्ष के लोगों ने समाज को रास्ता दिखाया। बेटी के सपने को वनस्पति से जोड़ कर एक नयी परंपरा की शुरुआत की गयी है, जिसका चतुर्दिक स्वागत हो रहा।
छह मई को समस्तीपुर जिले के मोहनपुर प्रखंडन्तर्गत रामचंद्रपुर दशहरा गांव में बहन की शादी को याद्गार बनाने में सुजीत भगत जुटे थे। घर की महिलाएं बेटी की शादी के रस्मों-रिवाज पूरी करने में लगी थीं। गांव के लोग बरात के स्वागत की तैयारी में लगे थे। दरवाजे पर शहनाई बज रही थी। इसी बीच दोपहर में लोगों का जमघट लगना शुरू हुआ। स्थानीय विधायक राणा गंगेश्वर सिंह, स्वतंत्रता सेनानी ब्रज विलास राय, शिक्षाविद् जनक किशोर कापर, डॉ सुनील कुमार, लडकी के पिता गणोश प्रसाद भगत समेत दर्जनों गणमान्य लोगों व ग्रामीणों की उपस्थिति में पंडित वैद्यनाथ प्रभाकर मंच से उद्घोषणा करते हैं कि शादी के इस पावन बेला में जरूरतमंदों के बीच 101 साड़ियां, 51 धोती एवं 101 पौधे उपहारस्वरूप भेंट किये जायेंगे। गरीबों के बीच साड़ी-धोती बांटी गयी। मंच से फिर घोषणा होती है कि जो इच्छुक व्यक्ति हैं वहीं पौधे लें। जो पौधे को अपनी संतान की तरह देखभाल करेंगे, उन्हें ही पौधे भेंट किये जायेंगे। मंच पर पौधे को संरक्षित करने की शपथ लेकर 87 लोग पौधे लेते हैं। शेष बचे 14 पौधों को लडकी पक्ष के लोगों ने घर के आसपास ही रोपे। ‘बेटी एवं पर्यावरण सुरक्षा हेतु पहल’ विषय पर करीब तीन घंटे तक गोष्ठी हुई। इसके बाद सराती पक्ष के लोग बराती के स्वागत में लग गये। रातभर शादी की रस्मों के बाद सुबह विदाई से पूर्व दूल्हा अमीर कुमार राय एवं दुल्हन पूनम कुमारी ने मिल कर एक पौधा रोप कर पर्यावरण को संरक्षित करने का संकल्प लिया। इस शादी में प्लास्टिक के सामान का प्रयोग पूर्णत: वजिर्त था। प्लास्टिक की जगह स्टील के 550 गिलास एवं पो के पाल का प्रयोग किया गया। सोनपुर निवासी दूल्हे के पिता गुलाबचंद राय समेत करीब 200 बरातियों ने इस पहल की सराहना की। गुजरात में बीमा निगम कर्मी के रूप में कार्यरत दूल्हा अमीर ने कहा कि ससुरालवालों के इस पुनीत काम की वजह से मेरी शादी याद्गार बन गयी। लड़की के भाई सुजीत बताते हैं कि मेरी इस योजना को परिवारवालों ने समर्थन किया, लेकिन गांव के कुछ लोगों को शुरू में यह कुछ अजीब लगा। शादी के बाद बधाइयां मिल रही हैं। वे कहते हैं कि जब मैं चौर में काम करने जाता था, तो उन गरीब-मजदूर महिलाओं को देख कर द्रवित हो जाता था जो छोटे-छोटे बच्चे लेकर काम करने खेतों में आती थीं। चौर में बड़े पेड़-पौधे नहीं होने के कारण जेठ की तपती धूप में बच्चे बिलबिलाते रहते थे और उसकी मां काम करती रहती थीं। तभी मैंने ठान लिया कि जीवन में पर्यावरण बचाने के लिए कुछ नया करुंगा।
स्थानीय विधायक राणा गंगेश्वर ंिसंह कहते हैं कि मैं इस शादी समारोह में मुख्य अतिथि था। सुजीत जी ने पुण्य का काम किया है। हम इस पहल को आगे बढ़ाने में मदद करेंगे। हम दूसरे लोगों से भी अपील करते हैं कि वे अपनी बेटी की शादी में भी पौधरोपण कर पर्यावरण बचाने के लिए आगे आयें।
इस शादी के दो हफ्ते बाद यह पहल आगे बढ़ती है। कुछ इसी तरह की शादी रोहतास जिले में भी होती है। शिवसागर प्रखंड का मोड़सराय गांव बनता है ‘इको फ्रेंडली शादी’ का गवाह। शिक्षाविद् जगदीश नारायण सिंह के पु़त्र राजीव रंजन एवं अकोढ़ीगोला गांव के विष्णुपद सिंह की लड़की अंकीता की शादी भी इलाके में चर्चा का विषय बन जाती है। 18 मई को तिलकोत्सव में मंत्रोच्चारण के बीच लड़के ने एक पौधा लगाया। 20 को बरात जाने को सजी कार में एक पौधा लेकर दूल्हा ससुराल पहुंचा। जयमाल के बाद वर-वधु ने पौधे लगाये। विदाई के समय वधु पक्ष की महिलाओं ने लड़की के खोईंछा में मोहिनी का एक पौधा दिया, जिसे 22 मई को बहुभोज के दिन नवदंपती ने लगाया। इस शादी में भी प्लास्टिक के बैग, गिलास व पाल का प्रयोग न के बराबर किया गया। आतिशबाजी नहीं हुई। लड़के के बड़े भाई डॉ राजेश नारायण सिंह के इस फैसले पर शुरू में कुछ लोगों ने हंसी उड़ायी, लेकिन बाद में लोगों का सहयोग मिलने लगा। पेशे से शिक्षक डॉ राजेश कहते हैं कि यदि पौधरोपण को मांगलिक कार्य से जोड़ दिया जाये, तो जैव विविधता में मजबूती, रिश्तों में प्रगाढ़ता एवं समाज में जागरूकता आयेगी। 2012 में अहमदाबाद में ‘एशिया पैसेफिक कुंजा कांफ्रेंस’ एवं हैदराबाद में ‘कॉप 11’ में हिस्सा लेकर लौटने के बाद डॉ राजेश ने तय किया था कि पर्यावरण संरक्षण के लिए लीक से हट कर कुछ करना है। वे इस काम को पहले अपने घर से ही शुरू करना चाहते थे। आगे उनकी योजना स्कूली छात्रों को लेकर इस अभियान को आगे बढ़ाने की है। स्थानीय विधायक जवाहर प्रसाद एवं जिला परिषद अध्यक्षा प्रमीला सिंह भी इस शादी की गवाह बनीं।

संतोष सारंग

panchayatnama